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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 4b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 4b

**चौ०** 
> इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥  
> सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥१॥

भावार्थ: यहाँ ( विमानपरसे ) सूर्यकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजी वानरोंको मनोहर नगर दिखला रहे हैं। [ वे कहते हैं— ] हे सुग्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है॥१॥

**चौ०** 
> जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥  
> अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥२॥

भावार्थ: यद्यपि सबने वैकुण्ठकी बड़ाई की है—यह वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत्‌ जानता है, परन्तु अवधपुरीके समान मुझे वह भी प्रिय नहीं है। यह बात ( भेद ) कोई-कोई ( विरले ही ) जानते हैं॥२॥

**चौ०** 
> जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥  
> जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥३॥

भावार्थ: यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशामें [ जीवोंको ] पवित्र करनेवाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करनेसे मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास ( सामीप्य मुक्ति ) पा जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥  
> हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥४॥

भावार्थ: यहाँके निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुखकी राशि और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुकी वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [ और कहने लगे कि ] जिस अवधकी स्वयं श्रीरामजीने बड़ाई की, वह [ अवश्य ही ] धन्य है॥४॥

**दो०** 
> आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।  
> नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान॥४ (क)॥

भावार्थ: कृपासागर भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजीने सब लोगोंको आते देखा, तो प्रभुने विमानको नगरके समीप उतरनेकी प्रेरणा की। तब वह पृथ्वीपर उतरा॥४(क)॥

**दो०** 
> उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।  
> प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु॥४ (ख)॥

भावार्थ: विमानसे उतरकर प्रभुने पुष्पकविमानसे कहा कि तुम अब कुबेरके पास जाओ। श्रीरामजीकी प्रेरणासे वह चला; उसे [ अपने स्वामीके पास जानेका ] हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीसे अलग होनेका अत्यन्त दुःख भी॥४(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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