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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 47"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 47

श्रीराम-वसिष्ठ-संवाद, श्रीरामजीका भाइयोंसहित अमराईमें जाना

**चौ०** 
> सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के॥  
> जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके अमृतके समान वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये [ और कहा— ] हे कृपानिधान! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥  
> असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥२॥

भावार्थ: और हे शरणागतके दुःख हरनेवाले रामजी! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकारसे हित करनेवाले हैं। ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता। माता-पिता [ हितैषी हैं और शिक्षा भी देते हैं ] परन्तु वे भी स्वार्थपरायण हैं [ इसलिये ऐसी परम हितकारी शिक्षा नहीं देते ]॥ २ ॥

**चौ०** 
> हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥  
> स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥३॥

भावार्थ: हे असुरोंके शत्रु! जगत्‌में बिना हेतुके ( निःस्वार्थ ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं—एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत्‌में [ शेष ] सभी स्वार्थके मित्र हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्नमें भी परमार्थका भाव नहीं है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सब के बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने॥  
> निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई॥४॥

भावार्थ: सबके प्रेमरसमें सने हुए वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी हृदयमें हर्षित हुए। फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुन्दर बातचीतका वर्णन करते हुए अपने-अपने घर गये॥ ४॥

**दो०** 
> उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।  
> ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप॥४७॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! अयोध्यामें रहनेवाले पुरुष और स्त्री सभी कृतार्थस्वरूप हैं; जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म श्रीरघुनाथजी राजा हैं॥ ४७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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