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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 46"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 46

**चौ०** 
> कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥  
> सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥१॥

भावार्थ: कहो तो, भक्तिमार्गमें कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योगकी आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवासकी! [ यहाँ इतना ही आवश्यक है कि ] सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसीमें सदा सन्तोष रखे॥ १ ॥

**चौ०** 
> मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥  
> बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥२॥

भावार्थ: मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्योंकी आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है? ( अर्थात्‌ उसकी मुझपर आस्था बहुत ही निर्बल है। ) बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ? हे भाइयो! मैं तो इसी आचरणके वशमें हूँ॥ २ ॥

**चौ०** 
> बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥  
> अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥३॥

भावार्थ: न किसीसे वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरम्भ ( फलकी इच्छासे कर्म ) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है ( जिसकी घरमें ममता नहीं है ), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [ भक्ति करनेमें ] निपुण और विज्ञानवान्‌ है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥  
> भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥४॥

भावार्थ: संतजनोंके संसर्ग ( सत्संग ) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मनमें सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [ भक्तिके सामने ] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [ दूसरेके मतका खण्डन करनेकी ] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कोंको दूर बहा दिया है,॥ ४ ॥

**दो०** 
> मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।  
> ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह॥४६॥

भावार्थ: जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [ परमात्मारूप ] परमानन्दराशिको प्राप्त है॥ ४६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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