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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 45"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 45

**चौ०** 
> जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू॥  
> सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥१॥

भावार्थ: यदि परलोकमें और यहाँ दोनों जगह सुख चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदयमें दृढ़तासे पकड़ रखो। हे भाई! यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदोंने इसे गाया है॥ १ ॥

**चौ०** 
> ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥  
> करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥२॥

भावार्थ: ज्ञान अगम ( दुर्गम ) है, [ और ] उसकी प्राप्तिमें अनेकों विघ्न हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मनके लिये कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करनेपर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होनेसे मुझको प्रिय नहीं होता॥ २ ॥

**चौ०** 
> भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥  
> पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥३॥

भावार्थ: भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है। परन्तु सत्संग ( संतोंके संग ) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति ( जन्म-मरणके चक्र ) का अन्त करती है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥  
> सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥४॥

भावार्थ: जगत्‌में पुण्य एक ही है, [ उसके समान ] दूसरा नहीं। वह है—मन, कर्म और वचनसे ब्राह्मणोंके चरणोंकी पूजा करना। जो कपटका त्याग करके ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।  
> संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥४५॥

भावार्थ: और भी एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शङ्करजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता॥ ४५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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