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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 42"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 42

श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता

**चौ०** 
> श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई॥  
> करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा॥१॥

भावार्थ: भगवान्‌के श्रीमुखसे ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये। प्रेम उनके हृदयोंमें समाता नहीं। वे बार-बार बड़ी विनती करते हैं। विशेषकर हनुमान्‌जीके हृदयमें अपार हर्ष है॥ १ ॥

**चौ०** 
> पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥  
> बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं॥२॥

भावार्थ: तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने महलको गये। इस प्रकार वे नित्य नयी लीला करते हैं। नारद मुनि अयोध्यामें बार-बार आते हैं और आकर श्रीरामजीके पवित्र चरित्र गाते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> नित नव चरित देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥  
> सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥३॥

भावार्थ: मुनि यहाँसे नित्य नये-नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा कहते हैं। ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [ और कहते हैं—] हे तात! बार-बार श्रीरामजीके गुणोंका गान करो॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥  
> सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥४॥

भावार्थ: सनकादि मुनि नारदजीकी सराहना करते हैं। यद्यपि वे ( सनकादि ) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजीका गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधिको भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं। वे [ रामकथा सुननेके ] श्रेष्ठ अधिकारी हैं॥ ४॥

**दो०** 
> जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।  
> जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥४२॥

भावार्थ: सनकादि मुनि-जैसे जीवन्मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भी ध्यान ( ब्रह्म-समाधि ) छोड़कर श्रीरामजीके चरित्र सुनते हैं। यह जानकर भी जो श्रीहरिकी कथासे प्रेम नहीं करते, उनके हृदय [ सचमुच ही ] पत्थर [ के समान ] हैं॥ ४२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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