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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 40"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 40

**चौ०** 
> लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न॥  
> काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥१॥

भावार्थ: लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है ( अर्थात्‌ लोभहीसे वे सदा घिरे हुए रहते हैं )। वे पशुओंके समान आहार और मैथुनके ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुरका भय नहीं लगता। यदि किसीकी बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी [ दुःखभरी ] साँस लेते हैं मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो॥१॥

**चौ०** 
> जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥  
> स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥२॥

भावार्थ: और जब किसीकी विपत्ति देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत्‌भरके राजा हो गये हों। वे स्वार्थपरायण, परिवारवालोंके विरोधी, काम और लोभके कारण लम्पट और अत्यन्त क्रोधी होते हैं॥२॥

**चौ०** 
> मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥  
> करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥३॥

भावार्थ: वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसीको नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [ साथ ही अपने संगसे ] दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं। उन्हें न संतोंका संग अच्छा लगता है, न भगवान्‌की कथा ही सुहाती है॥ ३॥

**चौ०** 
> अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥  
> बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥४॥

भावार्थ: वे अवगुणोंके समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी ( रागयुक्त ), वेदोंके निन्दक और जबर्दस्ती पराये धनके स्वामी ( लूटनेवाले ) होते हैं। वे दूसरोंसे द्रोह तो करते ही हैं; परन्तु ब्राह्मण-द्रोह विशेषतासे करते हैं। उनके हृदयमें दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे [ ऊपरसे ] सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं॥ ४॥

**दो०** 
> ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं।  
> द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥४०॥

भावार्थ: ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेतामें नहीं होते। द्वापरमें थोड़े-से होंगे और कलियुगमें तो इनके झुंड-के-झुंड होंगे॥ ४० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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