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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 3c"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 3c

**चौ०** 
> हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए॥  
> पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥१॥

भावार्थ: इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरीमें आये और उन्होंने गुरुजीको सब समाचार सुनाया। फिर राजमहलमें खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक नगरको आ रहे हैं॥१॥

**चौ०** 
> सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं॥  
> समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए॥२॥

भावार्थ: खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरतजीने प्रभुकी कुशल कहकर सबको समझाया। नगरनिवासियोंने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े॥२॥

**चौ०** 
> दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला॥  
> भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधुरगामिनी॥३॥

भावार्थ: [ श्रीरामजीके स्वागतके लिये ] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गलके मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोनेके थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ [ उन्हें लेकर ] गाती हुई चलीं॥३॥

**चौ०** 
> जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥  
> एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥४॥

भावार्थ: जो जैसे हैं ( जहाँ जिस दशामें हैं ) वे वैसे ही ( वहींसे उसी दशामें ) उठ दौड़ते हैं। [ देर हो जानेके डरसे ] बालकों और बूढ़ोंको कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरेसे पूछते हैं—भाई! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा है ?॥४॥

**चौ०** 
> अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी॥  
> बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥५॥

भावार्थ: प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी। तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहने लगी। सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गयीं ( अर्थात्‌ सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया )॥५॥

**दो०** 
> हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।  
> चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥३ (क)॥

भावार्थ: गुरु वसिष्ठजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणोंके समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मनसे कृपाधाम श्रीरामजीके सामने ( अर्थात्‌ उनकी अगवानीके लिये ) चले॥३(क)॥

**दो०** 
> बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।  
> देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान॥३ (ख)॥

भावार्थ: बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ीं आकाशमें विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वरसे सुन्दर मङ्गलगीत गा रही हैं॥३(ख)॥

**दो०** 
> राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।  
> बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥ ३ (ग)॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है [ इधर-उधर दौड़ती हुई ] स्त्रियाँ उसकी तरङ्गोंके समान लगती हैं॥३(ग)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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