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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 39"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 39

**चौ०** 
> सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥  
> तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई॥१॥

भावार्थ: अब असंतों ( दुष्टों ) का स्वभाव सुनो; कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिये। उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है। जैसे हरहाई ( बुरी जातिकी ) गाय कपिला ( सीधी और दुधार ) गायको अपने संगसे नष्ट कर डालती है॥१॥

**चौ०** 
> खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥  
> जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥२॥

भावार्थ: दुष्टोंके हृदयमें बहुत अधिक संताप रहता है। वे परायी सम्पत्ति ( सुख ) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरेकी निन्दा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्तेमें पड़ी निधि ( खजाना ) पा ली हो॥२॥

**चौ०** 
> काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥  
> बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥३॥

भावार्थ: वे काम, क्रोध, मद और लोभके परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापोंके घर होते हैं। वे बिना ही कारण सब किसीसे वैर किया करते हैं। जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई करते हैं॥३॥

**चौ०** 
> झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥  
> बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥४॥

भावार्थ: उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है। झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है ( अर्थात्‌ वे लेने-देनेके व्यवहारमें झूठका आश्रय लेकर दूसरोंका हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपये ले लिये, करोड़ोंका दान कर दिया। इसी प्रकार खाते हैं चनेकी रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आये। अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजनसे वैराग्य है, इत्यादि। मतलब यह कि वे सभी बातोंमें झूठ ही बोला करते हैं। ) जैसे मोर [ बहुत मीठा बोलता है, परन्तु उस ] का हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान्‌ विषैले साँपोंको भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपरसे मीठे वचन बोलते हैं [ परन्तु हृदयके बड़े ही निर्दयी होते हैं ]॥४॥

**दो०** 
> पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।  
> ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥३९॥

भावार्थ: वे दूसरोंसे द्रोह करते हैं और परायी स्त्री, पराये धन तथा परायी निन्दामें आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर-शरीर धारण किये हुए राक्षस ही हैं॥३९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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