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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 37"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 37

**चौ०** 
> करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥  
> संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥१॥

भावार्थ: तथापि हे कृपानिधान! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवकको सुख देनेवाले हैं [ इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्नका उत्तर देकर सुख दीजिये ]। हे रघुनाथजी! वेद-पुराणोंने संतोंकी महिमा बहुत प्रकारसे गायी है॥ १ ॥

**चौ०** 
> श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥  
> सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥२॥

भावार्थ: आपने भी अपने श्रीमुखसे उनकी बड़ाई की है और उनपर प्रभु ( आप ) का प्रेम भी बहुत है।हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ।आप कृपाके समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञानमें अत्यन्त निपुण हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥  
> संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥३॥

भावार्थ: हे शरणागतका पालन करनेवाले! संत और असंतके भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिये। [ श्रीरामजीने कहा— ] हे भाई! संतोंके लक्षण ( गुण ) असंख्य हैं, जो वेद और पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥  
> काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥४॥

भावार्थ: संत और असंतोंकी करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दनका आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दनको काटती है [ क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है ]; किन्तु चन्दन [ अपने स्वभाववश ] अपना गुण देकर उसे ( काटनेवाली कुल्हाड़ीको ) सुगन्धसे सुवासित कर देता है॥ ४॥

**दो०** 
> ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।  
> अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड॥३७॥

भावार्थ: इसी गुणके कारण चन्दन देवताओंके सिरोंपर चढ़ता है और जगत्‌का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ीके मुखको यह दण्ड मिलता है कि उसको आगमें जलाकर फिर घनसे पीटते हैं॥ ३७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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