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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 36"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 36

**चौ०** 
> सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए॥  
> पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥१॥

भावार्थ: सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। तब भाइयोंने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाया। सब भाई प्रभुसे पूछते सकुचाते हैं। [ इसलिये ] सब हनुमान्‌जीकी ओर देख रहे हैं॥१॥

**चौ०** 
> सुनी चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥  
> अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥२॥

भावार्थ: वे प्रभुके श्रीमुखकी वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमोंका नाश हो जाता है। अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये और पूछने लगे—कहो हनुमान्‌! क्या बात है ?॥२॥

**चौ०** 
> जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥  
> नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥३॥

भावार्थ: तब हनुमान्‌जी हाथ जोड़कर बोले—हे दीनदयालु भगवान्‌! सुनिये। हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मनमें सकुचा रहे हैं॥३॥

**चौ०** 
> तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥  
> सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥४॥

भावार्थ: [ भगवान्‌ने कहा— ] हनुमान्‌! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरतके और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर ( भेद ) है ? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [ और कहा— ] हे नाथ! हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! सुनिये॥ ४॥

**दो०** 
> नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।  
> केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥३६॥

भावार्थ: हे नाथ! न तो मुझे कुछ सन्देह है और न स्वप्नमें भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनन्दके समूह! यह केवल आपकी ही कृपाका फल है॥ ३६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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