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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 34"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 34

हनुमान्‌जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश

**चौ०** 
> सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥  
> जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥१॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीरसे स्तुति करने लगे—हे भगवन्‌! आपकी जय हो। आप अन्तरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक ( सब रूपोंमें प्रकट ), एक ( अद्वितीय ) और करुणामय हैं॥१॥

**चौ०** 
> जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥  
> जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥२॥

भावार्थ: हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुखके धाम, [ अत्यन्त ] सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वीके धारण करनेवाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं॥२॥

**चौ०** 
> ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥  
> तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥३॥

भावार्थ: आप ज्ञानके भण्डार, [ स्वयं ] मानरहित और [ दूसरोंको ] मान देनेवाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुन्दर यश गाते हैं। आप तत्त्वके जाननेवाले, की हुई सेवाको माननेवाले और अज्ञानका नाश करनेवाले हैं। हे निरञ्जन ( मायारहित )! आपके अनेकों ( अनन्त ) नाम हैं और कोई नाम नहीं है ( अर्थात्‌ आप सब नामोंके परे हैं )॥३॥

**चौ०** 
> सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥  
> द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय॥४॥

भावार्थ: आप सर्वरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं और सबके हृदयरूपी घरमें सदा निवास करते हैं; [ अतः ] आप हमारा परिपालन कीजिये। [ राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि ] द्वन्द्व, विपत्ति और जन्म-मृत्युके जालको काट दीजिये। हे रामजी! आप हमारे हृदयमें बसकर काम और मदका नाश कर दीजिये॥४॥

**दो०** 
> परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।  
> प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥३४॥

भावार्थ: आप परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम और मनकी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले हैं। हे श्रीरामजी! हमको अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति दीजिये॥३४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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