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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 33"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 33

**चौ०** 
> कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥  
> मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥१॥

भावार्थ: फिर हनुमान्‌जीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत्‌ की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजीकी अतुलनीय छबि देखकर उसीमें मग्न हो गये। वे मनको रोक न सके॥१॥

**चौ०** 
> स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥  
> एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥२॥

भावार्थ: वे जन्म-मृत्यु [ के चक्र ] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजीको टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥  
> कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥३॥

भावार्थ: उनकी [ प्रेमविह्वल ] दशा देखकर [ उन्हींकी भाँति ] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे— ॥३॥

**चौ०** 
> आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥  
> बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा॥ ४ ॥

भावार्थ: हे मुनीश्वरो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनोंहीसे [ सारे ] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्यसे सत्संगकी प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्युका चक्र नष्ट हो जाता है॥४॥

**दो०** 
> संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।  
> कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥३३॥

भावार्थ: संतका संग मोक्ष ( भव-बन्धनसे छूटने ) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [ आदि ] सभी सद्‌ग्रन्थ ऐसा कहते हैं॥३३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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