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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 32"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 32

**चौ०** 
> भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥  
> सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥१॥

भावार्थ: एक बार भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमान्‌जीको साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँके सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे॥ १ ॥

**चौ०** 
> जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥  
> ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥२॥

भावार्थ: सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुञ्ज, सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्दमें लवलीन रहते हैं। देखनेमें तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समयके॥ २ ॥

**चौ०** 
> रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥  
> आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥३॥

भावार्थ: मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजीकी चरित्र-कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥  
> राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥४॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे ( वहींसे चले आ रहे थे ) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनिने श्रीरामजीकी बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करनेमें उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है॥४॥

**दो०** 
> देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।  
> स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह॥३२॥

भावार्थ: सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने हर्षित होकर दण्डवत्‌ की और स्वागत ( कुशल ) पूछकर प्रभुने [ उनके ] बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया॥३२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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