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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 30"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 30

**चौ०** 
> जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥  
> भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥१॥

भावार्थ: लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो॥ १ ॥

**चौ०** 
> जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥  
> धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥२॥

भावार्थ: कमलनयन और साँवले शरीरवालेको भजो। पलकें जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करती हैं उसी प्रकार अपने सेवकोंकी रक्षा करनेवालेको भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवालेको भजो। संतरूपी कमलवनके [ खिलानेके ] लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजीको भजो॥ २ ॥

**चौ०** 
> काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥  
> लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥३॥

भावार्थ: कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो। निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो। कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो॥ ३ ॥

**चौ०** 
> संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥  
> जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥४॥

भावार्थ: संशय और शोकरूपी घने अन्धकारके नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो। राक्षसरूपी घने वनको जलानेवाले श्रीरामरूप अग्निको भजो। जन्म-मृत्युके भयको नाश करनेवाले श्रीजानकीजीसमेत श्रीरघुवीरको क्यों नहीं भजते ?॥ ४॥

**चौ०** 
> बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥  
> मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥५॥

भावार्थ: बहुत-सी वासनाओंरूपी मच्छरोंको नाश करनेवाले श्रीरामरूप हिमराशि ( बर्फके ढेर ) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजीको भजो। मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीका भार उतारनेवाले और तुलसीदासके उदार ( दयालु ) स्वामी श्रीरामजीको भजो॥ ५ ॥

**दो०** 
> एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।  
> सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥३०॥

भावार्थ: इस प्रकार नगरके स्त्री-पुरुष श्रीरामजीका गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं॥ ३० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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