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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 27"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 27

**चौ०** 
> नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥  
> दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥१॥

भावार्थ: नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्रीरामजीके दर्शनके लिये प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस [ दिव्य ] नगरको देखकर वैराग्य भुला देते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥  
> पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥२॥

भावार्थ: [ दिव्य ] स्वर्ण और रत्नोंसे बनी हुई अटारियाँ हैं। उनमें [ मणि-रत्नोंकी ] अनेक रंगोंकी सुन्दर ढली हुई फर्शें हैं। नगरके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिसपर सुन्दर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥  
> महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥३॥

भावार्थ: मानो नवग्रहोंने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावतीको आकर घेर लिया हो। पृथ्वी ( सड़कों ) पर अनेकों रंगोंके ( दिव्य ) काँचों ( रत्नों ) की गच बनायी ( ढाली ) गयी है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियोंके भी मन नाच उठते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥  
> बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥४॥

भावार्थ: उज्ज्वल महल ऊपर आकाशको चूम ( छू ) रहे हैं। महलोंपरके कलश [ अपने दिव्य प्रकाशसे ] मानो सूर्य, चन्द्रमाके प्रकाशकी भी निन्दा ( तिरस्कार ) करते हैं। [ महलोंमें ] बहुत-सी मणियोंसे रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घरमें मणियोंके दीपक शोभा पा रहे हैं॥ ४ ॥

**छं०** 
> मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची।  
> मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥  
> सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।  
> प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥

भावार्थ: घरोंमें मणियोंके दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगोंकी बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों ( रत्नों ) के खम्भे हैं। मरकतमणियों ( पन्नों ) से जड़ी हुई सोनेकी दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्माने खास तौरसे बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिकके आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वारपर बहुत-से खरादे हुए हीरोंसे जड़े हुए सोनेके किंवाड़ हैं।

**दो०** 
> चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।  
> राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥२७॥

भावार्थ: घर-घरमें सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्रीरामजीके चरित्र बड़ी सुन्दरताके साथ सँवारकर अङ्कित किये हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्तको चुरा लेते हैं॥ २७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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