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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 26"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 26

**चौ०** 
> प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥  
> बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥१॥

भावार्थ: प्रातःकाल सरयूजीमें स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते हैं। वसिष्ठजी वेद और पुराणोंकी कथाएँ वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं॥  
> भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई॥२॥

भावार्थ: वे भाइयोंको साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्दसे भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान्‌जीसहित उपवनोंमें जाकर,॥ २ ॥

**चौ०** 
> बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥  
> सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं॥३॥

भावार्थ: वहाँ बैठकर श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछते हैं और हनुमान्‌जी अपनी सुन्दर बुद्धिसे उन गुणोंमें गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणोंको सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सब कें गृह गृह होहिं पुराना। राम चरित पावन बिधि नाना॥  
> नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥४॥

भावार्थ: सबके यहाँ घर-घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन-रातका बीतना भी नहीं जान पाते॥ ४ ॥

**दो०** 
> अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।  
> सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥२६॥

भावार्थ: जहाँ भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-सम्पत्तिके समुदायका वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ २६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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