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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 24"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 24

**चौ०** 
> कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥  
> श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥१॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामजीने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनेकों दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्गके पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [प्रकृतिजन्य सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणोंसे अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्रके समान हैं॥१॥

**चौ०** 
> पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥  
> जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई॥२॥

भावार्थ: शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पतिके अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं॥२॥

**चौ०** 
> जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥  
> निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥३॥

भावार्थ: यद्यपि घरमें बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवाकी विधिमें कुशल हैं, तथापि [स्वामीकी सेवाका महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथोंसे करती हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं॥३॥

**चौ०** 
> जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥  
> कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥४॥

भावार्थ: कृपासागर श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकारसे सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवाकी विधिको जाननेवाली हैं। घरमें कौसल्या आदि सभी सासुओंकी सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बातका अभिमान और मद नहीं है॥४॥

**चौ०** 
> उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥५॥

भावार्थ: (शिवजी कहते हैं—) हे उमा! जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओंसे वन्दित और सदा अनिन्दित (सर्वगुणसम्पन्न) हैं॥५॥

**दो०** 
> जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।  
> राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥२४॥

भावार्थ: देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परन्तु वे उनकी ओर देखतीं भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने [महामहिम] स्वभावको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दमें प्रीति करती हैं॥२४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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