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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 21"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 21

**चौ०** 
> दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥  
> सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥१॥

भावार्थ: ‘राम-राज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं॥१॥

**चौ०** 
> चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥  
> राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥२॥

भावार्थ: धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्‌में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं॥२॥

**चौ०** 
> अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥  
> नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥३॥

भावार्थ: छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है॥३॥

**चौ०** 
> सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥  
> सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥४॥

भावार्थ: सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान्‌ हैं। सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं है॥४॥

**दो०** 
> राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।  
> काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥२१॥

भावार्थ: [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये। श्रीरामके राज्यमें जड़, चेतन सारे जगत्‌में काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख किसीको भी नहीं होते (अर्थात्‌ इनके बन्धनमें कोई नहीं है)॥२१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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