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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 20"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 20

**चौ०** 
> पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥  
> जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥१॥

भावार्थ: फिर कृपालु श्रीरामजीने निषादराजको बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसादमें दिये। [फिर कहा—] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्मसे धर्मके अनुसार चलना॥१॥

**चौ०** 
> तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥  
> बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥२॥

भावार्थ: तुम मेरे मित्र हो और भरतके समान भाई हो। अयोध्यामें सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसको भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रोंमें [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा॥२॥

**चौ०** 
> चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥  
> रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥३॥

भावार्थ: फिर भगवान्‌के चरणकमलोंको हृदयमें रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियोंको उसने प्रभुका स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजीका यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुखकी राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं॥३॥

**चौ०** 
> राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥  
> बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसीसे वैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता (आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी॥४॥

**दो०** 
> बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।  
> चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥२०॥

भावार्थ: सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है॥२०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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