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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 1b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 1b

**चौ०** 
> रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥  
> कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥ १ ॥

भावार्थ: प्राणोंकी आधाररूप अवधिका एक ही दिन शेष रह गया। यह सोचते ही भरतजीके मनमें अपार दुःख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये ? प्रभुने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया ?॥१॥

**चौ०** 
> अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥  
> कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥ २ ॥

भावार्थ: अहा हा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं, जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दके प्रेमी हैं ( अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए )। मुझे तो प्रभुने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीसे नाथने मुझे साथ नहीं लिया!॥२॥

**चौ०** 
> जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥  
> जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥ ३ ॥

भावार्थ: [ बात भी ठीक ही है, क्योंकि ] यदि प्रभु मेरी करनीपर ध्यान दें, तो सौ करोड़ ( असंख्य ) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार ( छुटकारा ) नहीं हो सकता। [ परन्तु आशा इतनी ही है कि ] प्रभु सेवकका अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभावके हैं॥३॥

**चौ०** 
> मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥  
> बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥ ४ ॥

भावार्थ: अतएव मेरे हृदयमें ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [ क्योंकि ] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जानेपर यदि मेरे प्राण रह गये तो जगत्‌में मेरे समान नीच कौन होगा ?॥४॥

**दो०** 
> राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।  
> बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥ १ (क) ॥

भावार्थ: श्रीरामजीके विरह-समुद्रमें भरतजीका मन डूब रहा था, उसी समय पवनपुत्र हनुमान्‌जी ब्राह्मणका रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [ उन्हें डूबनेसे बचानेके लिये ] नाव आ गयी हो॥१ (क)॥

**दो०** 
> बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।  
> राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ १ (ख) ॥

भावार्थ: हनुमान्‌जीने दुर्बलशरीर भरतजीको जटाओंका मुकुट बनाये, राम! राम! रघुपति! जपते और कमलके समान नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहाते कुशके आसनपर बैठे देखा॥१ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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