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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 19c"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 19c

रामराज्यका वर्णन

**चौ०** 
> भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥  
> अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥१॥

भावार्थ: भक्तकी करनीको याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुघ्नजी और लक्ष्मणजीसहित उनको पहुँचाने चले। अङ्गदके हृदयमें थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात्‌ बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिरकर श्रीरामजीकी ओर देखते हैं,॥१॥

**चौ०** 
> बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥  
> राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥२॥

भावार्थ: और बार-बार दण्डवत्‌-प्रणाम करते हैं। मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें। वे श्रीरामजीके देखनेकी, बोलनेकी, चलनेकी तथा हँसकर मिलनेकी रीतिको याद कर-करके सोचते हैं (दुःखी होते हैं)॥२॥

**चौ०** 
> प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी॥  
> अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥३॥

भावार्थ: किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदयमें चरण-कमलोंको रखकर वे चले। अत्यन्त आदरके साथ सब वानरोंको पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये॥३॥

**चौ०** 
> तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥  
> दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥४॥

भावार्थ: तब हनुमान्‌जीने सुग्रीवके चरण पकड़कर अनेक प्रकारसे विनती की और कहा—हे देव! दस (कुछ) दिन श्रीरघुनाथजीकी चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणोंके दर्शन करूँगा॥४॥

**चौ०** 
> पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा॥  
> अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥५॥

भावार्थ: [सुग्रीवने कहा—] हे पवनकुमार! तुम पुण्यकी राशि हो [जो भगवान्‌ने तुमको अपनी सेवामें रख लिया]। जाकर कृपाधाम श्रीरामजीकी सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अङ्गदने कहा—हे हनुमान्‌! सुनो—॥५॥

**दो०** 
> कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।  
> बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥१९(क)॥

भावार्थ: मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभुसे मेरी दण्डवत्‌ कहना और श्रीरघुनाथजीको बार-बार मेरी याद कराते रहना॥१९ (क)॥

**दो०** 
> अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।  
> तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत॥१९(ख)॥

भावार्थ: ऐसा कहकर बालिपुत्र अङ्गद चले, तब हनुमान्‌जी लौट आये और आकर प्रभुसे उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान्‌ प्रेममग्न हो गये॥१९ (ख)॥

**दो०** 
> कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।  
> चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥१९(ग)॥

भावार्थ: [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! श्रीरामजीका चित्त वज्रसे भी अत्यन्त कठोर और फूलसे भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझमें आ सकता है?॥१९ (ग)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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