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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 18b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 18b

**चौ०** 
> सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥  
> मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥ १ ॥

भावार्थ: हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुखके समुद्र! हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे आर्तोंके बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था॥१॥

**चौ०** 
> असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥  
> मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥२॥

भावार्थ: अतः हे भक्तोंके हितकारी! अपना अशरण-शरण विरद ( बाना ) याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?॥२॥

**चौ०** 
> तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥  
> बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥३॥

भावार्थ: हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु (आप) को छोड़कर घरमें मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बलसे हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये॥३॥

**चौ०** 
> नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥  
> अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥ ४ ॥

भावार्थ: मैं घरकी सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े [और बोले—] हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नाथ! आप यह न कहिये कि तू घर जा॥४॥

**दो०** 
> अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।  
> प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव॥१८ (क)॥

भावार्थ: अङ्गदके विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदयसे लगा लिया। प्रभुके नेत्रकमलोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥१८ (क)॥

**दो०** 
> निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।  
> बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥१८ (ख)॥

भावार्थ: तब भगवान्‌ने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि (रत्नोंके आभूषण) बालि-पुत्र अङ्गदको पहनाकर और बहुत प्रकारसे समझाकर उनकी विदाई की॥१८ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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