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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 16"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 16

**चौ०** 
> बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥  
> तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥१॥

भावार्थ: उन लोगोंको अपने घर भूल ही गये। [ जाग्रत्‌की तो बात ही क्या ] उन्हें स्वप्नमें भी घरकी सुध ( याद ) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरोंसे द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया। सबने आकर आदरसहित सिर नवाया॥ १ ॥

**चौ०** 
> परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥  
> तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥२॥

भावार्थ: बड़े ही प्रेमसे श्रीरामजीने उनको अपने पास बैठाया और भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुमलोगोंने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँहपर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ?॥ २ ॥

**चौ०** 
> ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥  
> अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥३॥

भावार्थ: मेरे हितके लिये तुमलोगोंने घरोंको तथा सब प्रकारके सुखोंको त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥  
> सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥४॥

भावार्थ: ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभीको प्यारे लगते हैं, यह नीति ( नियम ) है। [ पर ] मेरा तो दासपर [ स्वाभाविक ही ] विशेष प्रेम है॥ ४ ॥

**दो०** 
> अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।  
> सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥१६॥

भावार्थ: हे सखागण! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना॥ १६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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