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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 14b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 14b

**छं०** 
> जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं॥  
> अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ १ ॥

भावार्थ: हे राम! हे रमारमण ( लक्ष्मीकान्त )! हे जन्म-मरणके संतापका नाश करनेवाले! आपकी जय हो; आवागमनके भयसे व्याकुल इस सेवककी रक्षा कीजिये। हे अवधपति! हे देवताओंके स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये॥ १ ॥

**छं०** 
> दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥  
> रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥ २ ॥

भावार्थ: हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणका विनाश करके पृथ्वीके सब महान्‌ रोगों ( कष्टों ) को दूर करनेवाले श्रीरामजी! राक्षससमूहरूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्निके प्रचण्ड तेजसे भस्म हो गये॥ २ ॥

**छं०** 
> महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं॥  
> मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी॥ ३ ॥

भावार्थ: आप पृथ्वीमण्डलके अत्यन्त सुन्दर आभूषण हैं; आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किये हुए हैं। महान्‌ मद, मोह और ममतारूपी रात्रिके अन्धकारसमूहके नाश करनेके लिये आप सूर्यके तेजोमय किरणसमूह हैं॥ ३ ॥

**छं०** 
> मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए॥  
> हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे॥ ४ ॥

भावार्थ: कामदेवरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनोंके हृदयमें कुभोगरूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है। हे नाथ! हे [ पाप-तापका हरण करनेवाले ] हरे! उसे मारकर विषयरूपी वनमें भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवोंकी रक्षा कीजिये॥ ४ ॥

**छं०** 
> बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए॥  
> भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते॥ ५ ॥

भावार्थ: लोग बहुत-से रोगों और वियोगों ( दुःखों ) से मारे हुए हैं। ये सब आपके चरणोंके निरादरके फल हैं। जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें पड़े हैं॥ ५ ॥

**छं०** 
> अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं॥  
> अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥ ६ ॥

भावार्थ: जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन ( उदास ) और दुःखी रहते हैं। और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान्‌ सदा प्रिय लगने लगते हैं॥ ६ ॥

**छं०** 
> नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥  
> एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥ ७ ॥

भावार्थ: उनमें न राग ( आसक्ति ) है, न लोभ; न मान है, न मद। उनको सम्पत्ति ( सुख ) और विपत्ति ( दुःख ) समान है। इसीसे मुनिलोग योग ( साधन ) का भरोसा सदाके लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं॥ ७ ॥

**छं०** 
> करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ॥  
> सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही॥ ८ ॥

भावार्थ: वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं॥ ८ ॥

**छं०** 
> मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे॥  
> तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी॥ ९ ॥

भावार्थ: हे मुनियोंके मनरूपी कमलके भ्रमर! हे महान्‌ रणधीर एवं अजेय श्रीरघुवीर! मैं आपको भजता हूँ ( आपकी शरण ग्रहण करता हूँ )। हे हरि! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरणरूपी रोगकी महान्‌ औषध और अभिमानके शत्रु हैं॥ ९ ॥

**छं०** 
> गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥  
> रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीनजनं॥१०॥

भावार्थ: आप गुण, शील और कृपाके परम स्थान हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! [ आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि ] द्वन्द्व-समूहोंका नाश कीजिये। हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले राजन्‌! इस दीन जनकी ओर भी दृष्टि डालिये॥ १० ॥

**दो०** 
> बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।  
> पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥१४(क)॥

भावार्थ: मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्सङ्ग सदा प्राप्त हो। हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये॥ १४ ( क ) ॥

**दो०** 
> बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।  
> तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास॥१४(ख)॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये। तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले डेरे दिलवाये॥ १४ ( ख ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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