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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 130b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 130b

**चौ०** 
> यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा॥  
> भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥१॥

भावार्थ: शम्भु-उमाका यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करनेवाला और शोकका नाश करनेवाला है। जन्म-मरणका अन्त करनेवाला, सन्देहोंका नाश करनेवाला, भक्तोंको आनन्द देनेवाला और संत पुरुषोंको प्रिय है॥१॥

**चौ०** 
> राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाहीं॥  
> रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा॥२॥

भावार्थ: जगत्‌में जो ( जितने भी ) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथाके समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैंने यह सुन्दर और पवित्र करनेवाला चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है॥२॥

**चौ०** 
> एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥  
> रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥३॥

भावार्थ: [ तुलसीदासजी कहते हैं— ] इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजीका ही स्मरण करना, श्रीरामजीका ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजीके ही गुणसमूहोंको सुनना चाहिये॥३॥

**चौ०** 
> जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥  
> ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥४॥

भावार्थ: पतितोंको पवित्र करना जिनका महान्‌ ( प्रसिद्ध ) बाना है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं—रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज। श्रीरामको भजनेसे किसने परम गति नहीं पायी?॥४॥

**छं०** 
> पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।  
> गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥  
> आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।  
> कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥१॥

भावार्थ: अरे मूर्ख मन! सुन, पतितोंको भी पावन करनेवाले श्रीरामको भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टोंको उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच ( चाण्डाल ) आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥१॥

**छं०** 
> रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।  
> कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥  
> सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।  
> दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै॥२॥

भावार्थ: जो मनुष्य रघुवंशके भूषण श्रीरामजीका यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुगके पाप और मनके मलको धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजीके परम धामको चले जाते हैं। [ अधिक क्या ] जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयोंको भी मनोहर जानकर [ अथवा रामायणकी चौपाइयोंको श्रेष्ठ पंच ( कर्तव्याकर्तव्यका सच्चा निर्णायक ) जानकर उनको ] हृदयमें धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकारकी अविद्याओंसे उत्पन्न विकारोंको श्रीरामजी हरण कर लेते हैं। ( अर्थात्‌ सारे रामचरित्रकी तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयोंको भी समझकर उनका अर्थ हृदयमें धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्रीरामचन्द्रजी हर लेते हैं)॥२॥

**छं०** 
> सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।  
> सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥  
> जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।  
> पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥३॥

भावार्थ: [ परम ] सुन्दर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथोंपर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्रीरामचन्द्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करनेवाला (सुहृद्) और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपासे मन्दबुद्धि तुलसीदासने भी परम शान्ति प्राप्त कर ली, उन श्रीरामजीके समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं॥३॥

**दो०** 
> मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।  
> अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥१३० (क)॥

भावार्थ: हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनोंका हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरणके भयानक दुःखका हरण कर लीजिये॥१३०(क)॥

**दो०** 
> कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।  
> तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥१३० (ख)॥

भावार्थ: जैसे कामीको स्त्री प्रिय लगती है और लोभीको जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी! हे रामजी! आप निरन्तर मुझे प्रिय लगिये॥१३०(ख)॥

**श्लोक** 
> यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं  
> श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम्।  
> मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये  
> भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्॥१॥

भावार्थ: श्रेष्ठ कवि भगवान्‌ श्रीशंकरजीने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायणकी, श्रीरामजीके चरणकमलोंमें नित्य-निरन्तर [ अनन्य ] भक्ति प्राप्त होनेके लिये, रचना की थी, उस मानस-रामायणको श्रीरघुनाथजीके नाममें निरत मानकर अपने अन्तःकरणके अन्धकारको मिटानेके लिये तुलसीदासने इस मानसके रूपमें भाषाबद्ध किया॥१॥

**श्लोक** 
> पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं  
> मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।  
> श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये  
> ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥२॥

भावार्थ: यह श्रीरामचरितमानस पुण्यरूप, पापोंका हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्तिको देनेवाला, माया, मोह और मलका नाश करनेवाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जलसे परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानससरोवरमें गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्यकी अति प्रचण्ड किरणोंसे नहीं जलते॥२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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