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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 129"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 129

**चौ०** 
> राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥  
> संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥१॥

भावार्थ: हे गिरिजे! मैंने कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली और मनके मलको दूर करनेवाली रामकथाका वर्णन किया। यह रामकथा संसृति ( जन्म-मरण )-रूपी रोगके [ नाशके ] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान्‌ पुरुष ऐसा कहते हैं॥१॥

**चौ०** 
> एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना॥  
> अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई॥२॥

भावार्थ: इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको प्राप्त करनेके मार्ग हैं। जिसपर श्रीहरिकी अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्गपर पैर रखता है॥२॥

**चौ०** 
> मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥  
> कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥३॥

भावार्थ: जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मनःकामनाकी सिद्धि पा लेते हैं। जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन ( प्रशंसा ) करते हैं, वे संसाररूपी समुद्रको गौके खुरसे बने हुए गड्ढेकी भाँति पार कर जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> सुनि सब कथा हृदय अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥  
> नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा॥४॥

भावार्थ: [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— ] सब कथा सुनकर श्रीपार्वतीजीके हृदयको बहुत ही प्रिय लगी और वे सुन्दर वाणी बोलीं—स्वामीकी कृपासे मेरा सन्देह जाता रहा और श्रीरामजीके चरणोंमें नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया॥४॥

**दो०** 
> मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस।  
> उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस॥१२९॥

भावार्थ: हे विश्वनाथ! आपकी कृपासे अब मैं कृतार्थ हो गयी। मुझमें दृढ़ रामभक्ति उत्पन्न हो गयी और मेरे सम्पूर्ण क्लेश बीत गये ( नष्ट हो गये )॥१२९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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