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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 125b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 125b

**चौ०** 
> मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥  
> राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई॥१॥

भावार्थ: श्रीरघुवीरके भक्ति-रसमें सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामजीके चरणोंमें मेरी नवीन प्रीति हो गयी और मायासे उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी॥१॥

**चौ०** 
> मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए॥  
> मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा॥२॥

भावार्थ: मोहरूपी समुद्रमें डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज हुए। हे नाथ! आपने मुझे बहुत प्रकारके सुख दिये ( परम सुखी कर दिया )। मुझसे इसका प्रत्युपकार ( उपकारके बदलेमें उपकार ) नहीं हो सकता। मैं तो आपके चरणोंकी बार-बार वन्दना ही करता हूँ॥२॥

**चौ०** 
> पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी॥  
> संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी॥३॥

भावार्थ: आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामजीके प्रेमी हैं। हे तात! आपके समान कोई बड़भागी नहीं है। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी—इन सबकी क्रिया पराये हितके लिये ही होती है॥३॥

**चौ०** 
> संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥  
> निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥४॥

भावार्थ: संतोंका हृदय मक्खनके समान होता है, ऐसा कवियोंने कहा है; परन्तु उन्होंने [ असली बात ] कहना नहीं जाना। क्योंकि मक्खन तो अपनेको ताप मिलनेसे पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरोंके दुःखसे पिघल जाते हैं॥४॥

**चौ०** 
> जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ॥  
> जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर॥५॥

भावार्थ: मेरा जीवन और जन्म सफल हो गया। आपकी कृपासे सब सन्देह चला गया। मुझे सदा अपना दास ही जानियेगा। [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! पक्षिश्रेष्ठ गरुड़जी बार-बार ऐसा कह रहे हैं॥५॥

**दो०** 
> तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।  
> गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर॥१२५ (क)॥

भावार्थ: उन ( भुशुण्डिजी ) के चरणोंमें प्रेमसहित सिर नवाकर और हृदयमें श्रीरघुवीरको धारण करके धीरबुद्धि गरुड़जी तब वैकुण्ठको चले गये॥१२५ (क)॥

**दो०** 
> गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।  
> बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥१२५ (ख)॥

भावार्थ: हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह ( संत-समागम ) श्रीहरिकी कृपाके बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं॥१२५ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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