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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 123b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 123b

**श्लोक** 
> विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।  
> हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥१२२ (ग)॥

भावार्थ: मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ—मेरे वचन अन्यथा ( मिथ्या ) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [ सहज ही ] पार कर जाते हैं॥ १२२ ( ग )॥

**चौ०** 
> कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा॥  
> श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥१॥

भावार्थ: हे नाथ! मैंने श्रीहरिका अनुपम चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे कहा। हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! श्रुतियोंका यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर ( छोड़कर ) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये॥ १॥

**चौ०** 
> प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥  
> तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥२॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरघुनाथजीको छोड़कर और किसका सेवन ( भजन ) किया जाय, जिनका मुझ-जैसे मूर्खपर भी ममत्व ( स्नेह ) है। हे नाथ! आप विज्ञानरूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझपर बड़ी कृपा की है॥ २॥

**चौ०** 
> पूँछिहु राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥  
> सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥३॥

भावार्थ: जो आपने मुझसे शुकदेवजी, सनकादि और शिवजीके मनको प्रिय लगनेवाली अति पवित्र रामकथा पूछी। संसारमें घड़ीभरका अथवा पलभरका एक बारका भी सत्संग दुर्लभ है॥ ३॥

**चौ०** 
> देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥  
> सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥४॥

भावार्थ: हे गरुड़जी! अपने हृदयमें विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजीके भजनका अधिकारी हूँ? पक्षियोंमें सबसे नीच और सब प्रकारसे अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होनेपर भी प्रभुने मुझको सारे जगत्‌को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [ अथवा प्रभुने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया ]॥ ४॥

**दो०** 
> आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।  
> निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥१२३ (क)॥

भावार्थ: यद्यपि मैं सब प्रकारसे हीन ( नीच ) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो श्रीरामजीने मुझे अपना ‘निज जन’ जानकर संत-समागम दिया ( आपसे मेरी भेंट करायी )॥ १२३ ( क )॥

**दो०** 
> नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।  
> चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ॥१२३ (ख)॥

भावार्थ: हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार कहा, कुछ भी छिपा नहीं रखा। [ फिर भी ] श्रीरघुवीरके चरित्र समुद्रके समान हैं; क्या उनकी कोई थाह पा सकता है?॥ १२३ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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