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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 11c"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 11c

राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति

**चौ०** 
> अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥  
> राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥१॥

भावार्थ: अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी। देवताओंने पुष्पोंकी वर्षाकी झड़ी लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीने सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको स्नान कराओ॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥  
> पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे॥२॥

भावार्थ: भगवान्‌के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादिको स्नान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजीको बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया॥ २ ॥

**चौ०** 
> अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥  
> भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥३॥

भावार्थ: तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजीने तीनों भाइयोंको स्नान कराया। भरतजीका भाग्य और प्रभुकी कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥  
> करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥४॥

भावार्थ: फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभुने आभूषण धारण किये। उनके [ सुशोभित ] अङ्गोंको देखकर सैकड़ों ( असंख्य ) कामदेव लजा गये॥ ४ ॥

**दो०** 
> सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।  
> दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ॥११ (क)॥

भावार्थ: [ इधर ] सासुओंने जानकीजीको आदरके साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अङ्ग-अङ्गमें दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये ( पहना दिये )॥ ११ ( क ) ॥

**दो०** 
> राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।  
> देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि॥११ (ख)॥

भावार्थ: श्रीरामके बायीं ओर रूप और गुणोंकी खान रमा ( श्रीजानकीजी ) शोभित हो रही हैं। उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म ( जीवन ) सफल समझकर हर्षित हुईं॥ ११ ( ख ) ॥

**दो०** 
> सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।  
> चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद॥११ (ग)॥

भावार्थ: [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान्‌के दर्शन करनेके लिये आये॥ ११ ( ग ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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