---
title: "उत्तरकाण्ड दोहा 119b"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-119b"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड · दोहा 119b

**चौ०** 
> ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥  
> जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥१॥

भावार्थ: ज्ञानका मार्ग कृपाण ( दुधारी तलवार ) की धारके समान है। हे पक्षिराज! इस मार्गसे गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्गको निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य ( मोक्ष ) रूप परमपदको प्राप्त करता है॥१॥

**चौ०** 
> अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥  
> राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआईं॥२॥

भावार्थ: संत, पुराण, वेद और [ तन्त्र आदि ] शास्त्र [ सब ] यह कहते हैं कि कैवल्यरूप परमपद अत्यन्त दुर्लभ है; किन्तु हे गोसाईं! वही [ अत्यन्त दुर्लभ ] मुक्ति श्रीरामजीको भजनेसे बिना इच्छा किये भी जबरदस्ती आ जाती है॥२॥

**चौ०** 
> जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥  
> तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥३॥

भावार्थ: जैसे स्थलके बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकारके उपाय क्यों न करे। वैसे ही, हे पक्षिराज! सुनिये, मोक्षसुख भी श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर नहीं रह सकता॥३॥

**चौ०** 
> अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥  
> भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥ ४ ॥

भावार्थ: ऐसा विचारकर बुद्धिमान्‌ हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं। भक्ति करनेसे संसृति ( जन्म-मृत्युरूप संसार ) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रमके ( अपने-आप ) वैसे ही नष्ट हो जाती है,॥४॥

**चौ०** 
> भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥  
> असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥ ५ ॥

भावार्थ: जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराग्नि अपने-आप ( बिना हमारी चेष्टाके ) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?॥५॥

**दो०** 
> सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।  
> भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ (क) ॥

भावार्थ: हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान्‌ मेरे सेव्य ( स्वामी ) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका भजन कीजिये॥११९(क)॥

**दो०** 
> जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।  
> अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य॥ ११९ (ख) ॥

भावार्थ: जो चेतनको जड कर देता है और जडको चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं॥११९(ख)॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-118b  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-120b

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
