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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 114b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 114b

**चौ०** 
> काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥  
> राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥१॥

भावार्थ: काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभावसे उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा। अनेकों प्रकारके सुन्दर श्रीरामजीके रहस्य ( गुप्त मर्मके चरित्र और गुण ), जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं ( वर्णित और लक्षित हैं )॥१॥

**चौ०** 
> बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥  
> जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥२॥

भावार्थ: तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजीके चरणोंमें तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मनमें तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरिकी कृपासे उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी॥२॥

**चौ०** 
> सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा॥  
> एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥३॥

भावार्थ: हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, मुनिका आशीर्वाद सुनकर आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही ( सत्य ) हो। यह कर्म, मन और वचनसे मेरा भक्त है॥३॥

**चौ०** 
> सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ॥  
> करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई॥४॥

भावार्थ: आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। मैं प्रेममें मग्न हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा। तदनन्तर मुनिकी विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरणकमलोंमें बार-बार सिर नवाकर— ॥४॥

**चौ०** 
> हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥  
> इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा॥५॥

भावार्थ: मैं हर्षसहित इस आश्रममें आया। प्रभु श्रीरामजीकी कृपासे मैंने दुर्लभ वर पा लिया। हे पक्षिराज! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गये॥५॥

**चौ०** 
> करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना॥  
> जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा॥६॥

भावार्थ: मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजीके गुणोंका गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। अयोध्यापुरीमें जब-जब श्रीरघुवीर भक्तोंके [ हितके ] लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं,॥६॥

**चौ०** 
> तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥  
> पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥७॥

भावार्थ: तब-तब मैं जाकर श्रीरामजीकी नगरीमें रहता हूँ और प्रभुकी शिशुलीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ। फिर हे पक्षिराज! श्रीरामजीके शिशुरूपको हृदयमें रखकर मैं अपने आश्रममें आ जाता हूँ॥७॥

**चौ०** 
> कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई॥  
> कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी॥८॥

भावार्थ: जिस कारणसे मैंने कौएकी देह पायी, वह सारी कथा आपको सुना दी। हे तात! मैंने आपके सब प्रश्नोंके उत्तर कहे। अहा! रामभक्तिकी बड़ी भारी महिमा है॥८॥

**दो०** 
> ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।  
> निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥११४(क)॥

भावार्थ: मुझे अपना यह काकशरीर इसीलिये प्रिय है कि इसमें मुझे श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम प्राप्त हुआ। इसी शरीरसे मैंने अपने प्रभुके दर्शन पाये और मेरे सब सन्देह जाते रहे ( दूर हुए )॥११४(क)॥

**दो०** 
> भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।  
> मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥११४(ख)॥

भावार्थ: मैं हठ करके भक्तिपक्षपर अड़ा रहा, जिससे महर्षि लोमशने मुझे शाप दिया; परन्तु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियोंको भी दुर्लभ है, वह वरदान मैंने पाया। भजनका प्रताप तो देखिये!॥११४(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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