---
title: "उत्तरकाण्ड दोहा 109d"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-109d"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड · दोहा 109d

**चौ०** 
> एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना॥  
> बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी॥१॥

भावार्थ: हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरेके हितसे सनी हुई ब्राह्मणकी वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई—‘एवमस्तु’ ( ऐसा ही हो )॥ १ ॥

**चौ०** 
> जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा॥  
> तदपि तुम्हारि साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी॥२॥

भावार्थ: यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी॥  
> मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि॥३॥

भावार्थ: हे द्विज! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी। हे द्विज! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा। यह हजार जन्म अवश्य पावेगा॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जनमत मरत दुसह दुख होई। एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥  
> कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥४॥

भावार्थ: परन्तु जन्मने और मरनेमें जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। हे शूद्र! मेरा प्रामाणिक ( सत्य ) वचन सुन॥ ४॥

**चौ०** 
> रघुपति पुरीं जन्म तव भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ॥  
> पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें॥५॥

भावार्थ: [ प्रथम तो ] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी पुरीमें हुआ। फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया। पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न होगी॥ ५ ॥

**चौ०** 
> सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई॥  
> अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेसु संत अनंत समाना॥६॥

भावार्थ: हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजोंकी सेवा ही भगवान्‌को प्रसन्न करनेवाला व्रत है। अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना। संतोंको अनन्त श्रीभगवान्‌हीके समान जानना॥ ६ ॥

**चौ०** 
> इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥  
> जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई॥७॥

भावार्थ: इन्द्रके वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालके दण्ड और श्रीहरिके विकराल चक्रके मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रदोहरूपी अग्निसे भस्म हो जाता है॥ ७॥

**चौ०** 
> अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥  
> औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी॥ ८॥

भावार्थ: ऐसा विवेक मनमें रखना। फिर तुम्हारे लिये जगत्‌में कुछ भी दुर्लभ न होगा। मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति होगी ( अर्थात् तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहीं बिना रोक-टोकके जा सकोगे )॥ ८॥

**दो०** 
> सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।  
> मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥१०९ (क)॥

भावार्थ: [ आकाशवाणीके द्वारा ] शिवजीके वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजीके चरणोंको हृदयमें रखकर अपने घर गये॥ १०९ ( क )॥

**दो०** 
> प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल।  
> पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल॥१०९ (ख)॥

भावार्थ: कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचलमें जाकर सर्प हुआ। फिर कुछ काल बीतनेपर बिना ही परिश्रम ( कष्ट ) के मैंने वह शरीर त्याग दिया॥ १०९ ( ख )॥

**दो०** 
> जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान।  
> जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान॥१०९ (ग)॥

भावार्थ: हे हरिवाहन! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है॥ १०९ ( ग )॥

**दो०** 
> सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस।  
> एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउ खगेस॥१०९ (घ)॥

भावार्थ: शिवजीने वेदकी मर्यादाकी रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षिराज! मैंने बहुत-से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया॥१०९(घ)॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-108d  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-110d

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
