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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 108d"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 108d

गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी आगेकी कथा

**छं०** 
> नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥  
> निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥१॥

भावार्थ: हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशाके ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूपमें स्थित ( अर्थात्‌ मायादिरहित ), [ मायिक ] गुणोंसे रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाशको ही वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले दिगम्बर [ अथवा आकाशको भी आच्छादित करनेवाले ] आपको मैं भजता हूँ॥१॥

**छं०** 
> निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥  
> करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥२॥

भावार्थ: निराकार, ओङ्कारके मूल, तुरीय ( तीनों गुणोंसे अतीत ), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियोंसे परे, कैलासपति, विकराल, महाकालके भी काल, कृपालु, गुणोंके धाम, संसारसे परे आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ॥२॥

**छं०** 
> तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥  
> स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥३॥

भावार्थ: जो हिमाचलके समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिरपर सुन्दर नदी गङ्गाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और गलेमें सर्प सुशोभित हैं॥३॥

**छं०** 
> चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥  
> मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥४॥

भावार्थ: जिनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्मका वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [ कल्याण करनेवाले ] श्रीशङ्करजीको मैं भजता हूँ॥४॥

**छं०** 
> प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥  
> त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥५॥

भावार्थ: प्रचण्ड ( रुद्ररूप ), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशवाले, तीनों प्रकारके शूलों ( दुःखों ) को निर्मूल करनेवाले, हाथमें त्रिशूल धारण किये, भाव ( प्रेम ) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानीके पति श्रीशङ्करजीको मैं भजता हूँ॥५॥

**छं०** 
> कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥  
> चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥

भावार्थ: कलाओंसे परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त ( प्रलय ) करनेवाले, सज्जनोंको सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुरके शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोहको हरनेवाले, मनको मथ डालनेवाले कामदेवके शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये॥६॥

**छं०** 
> न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥  
> न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥७॥

भावार्थ: जबतक पार्वतीके पति आपके चरणकमलोंको मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोकमें सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापोंका नाश होता है। अतः हे समस्त जीवोंके अंदर ( हृदयमें ) निवास करनेवाले प्रभो! प्रसन्न हूजिये॥७॥

**छं०** 
> न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥  
> जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥८॥

भावार्थ: मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म [ मृत्यु ] के दुःखसमूहोंसे जलते हुए मुझ दुखीकी दुःखसे रक्षा कीजिये। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥८॥

**श्लोक** 
> रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।  
> ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥९॥

भावार्थ: भगवान्‌ रुद्रकी स्तुतिका यह अष्टक उन शङ्करजीकी तुष्टि ( प्रसन्नता ) के लिये ब्राह्मणद्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान्‌ शम्भु प्रसन्न होते हैं॥९॥

**दो०** 
> सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।  
> पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥१०८ (क)॥

भावार्थ: सर्वज्ञ शिवजीने विनती सुनी और ब्राह्मणका प्रेम देखा। तब मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ! वर माँगो॥१०८ ( क )॥

**दो०** 
> जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।  
> निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥१०८ (ख)॥

भावार्थ: [ ब्राह्मणने कहा— ] हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीनपर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणोंकी भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिये॥१०८ ( ख )॥

**दो०** 
> तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।  
> तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान॥१०८ (ग)॥

भावार्थ: हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपकी मायाके वश होकर निरन्तर भूला फिरता है। हे कृपाके समुद्र भगवान्‌! उसपर क्रोध न कीजिये॥१०८ ( ग )॥

**दो०** 
> संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।  
> साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥१०८ (घ)॥

भावार्थ: हे दीनोंपर दया करनेवाले [ कल्याणकारी ] शङ्कर! अब इसपर कृपालु होइये ( कृपा कीजिये ), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समयमें इसपर शापके बाद अनुग्रह ( शापसे मुक्ति ) हो जाय॥१०८ ( घ )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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