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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 101b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 101b

**छं०** 
> बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥  
> तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही॥ १॥

भावार्थ: संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयोंने हर लिया। तपस्वी धनवान्‌ हो गये और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुगकी लीला कुछ कही नहीं जाती॥१॥

**छं०** 
> कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती॥  
> सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥ २॥

भावार्थ: कुलवती और सती स्त्रीको पुरुष घरसे निकाल देते हैं और अच्छी चालको छोड़कर घरमें दासीको ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक स्त्रीका मुँह नहीं दिखायी पड़ा॥२॥

**छं०** 
> ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥  
> नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥ ३॥

भावार्थ: जबसे ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुटुम्बी शत्रुरूप हो गये। राजा लोग पापपरायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजाको नित्य ही [ बिना अपराध ] दण्ड देकर उसकी विडम्बना ( दुर्दशा ) किया करते हैं॥३॥

**छं०** 
> धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी॥  
> नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो॥ ४॥

भावार्थ: धनी लोग मलिन ( नीच जातिके ) होनेपर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विजका चिह्न जनेऊमात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वीका। जो वेदों और पुराणोंको नहीं मानते, कलियुगमें वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥४॥

**छं०** 
> कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥  
> कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥ ५॥

भावार्थ: कवियोंके तो झुंड हो गये, पर दुनियामें उदार ( कवियोंका आश्रयदाता ) सुनायी नहीं पड़ता। गुणमें दोष लगानेवाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है। कलियुगमें बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्नके बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं॥५॥

**दो०** 
> सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।  
> मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड॥ १०१ (क)॥

भावार्थ: हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ ( दुराग्रह ), दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह और काम आदि ( अर्थात्‌ काम, क्रोध और लोभ ) और मद ब्रह्माण्डभरमें व्याप्त हो गये ( छा गये )॥१०१ ( क )॥

**दो०** 
> तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान।  
> देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान॥ १०१ (ख)॥

भावार्थ: मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भावसे करने लगे। देवता ( इन्द्र ) पृथ्वीपर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥१०१ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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