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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 100b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 100b

**चौ०** 
> पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने॥  
> तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर॥ १॥

भावार्थ: जो परायी स्त्रीमें आसक्त, कपट करनेमें चतुर और मोह, द्रोह और ममतामें लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी ( ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाले ) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुगका यह चरित्र देखा॥१॥

**चौ०** 
> आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं॥  
> कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥ २॥

भावार्थ: वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं; जो कहीं सन्मार्गका प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेदकी निन्दा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरकमें पड़े रहते हैं॥२॥

**चौ०** 
> जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥  
> नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥ ३॥

भावार्थ: तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्णमें नीचे हैं, स्त्रीके मरनेपर अथवा घरकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥  
> बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी॥ ४॥

भावार्थ: वे अपनेको ब्राह्मणोंसे पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जातिकी व्यभिचारिणी स्त्रियोंके स्वामी होते हैं॥४॥

**चौ०** 
> सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना॥  
> सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा॥ ५॥

भावार्थ: शूद्र नाना प्रकारके जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन ( व्यासगद्दी ) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता॥५॥

**दो०** 
> भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।  
> करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥ १०० (क)॥

भावार्थ: कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर और मर्यादासे च्युत हो गये। वे पाप करते हैं और [ उनके फलस्वरूप ] दुःख, भय, रोग, शोक और [ प्रिय वस्तुका ] वियोग पाते हैं॥१०० ( क )॥

**दो०** 
> श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।  
> तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक॥ १०० (ख)॥

भावार्थ: वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं॥१०० ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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