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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 8"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 8

हनुमान्‌जीका अशोकवाटिकामें सीताको देखकर दुःखी होना और रावणका सीताजीको भय दिखलाना

**चौ०** 
> जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥  
> एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥१॥

भावार्थ: जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी ( श्रीरघुनाथजी ) को भुलाकर [ विषयोंके पीछे ] भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय ( परम ) शान्ति प्राप्त की॥१॥

**चौ०** 
> पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥  
> तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥२॥

भावार्थ: फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ ( लङ्कामें ) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्‌जीने कहा—हे भाई! सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ॥२॥

**चौ०** 
> जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥  
> करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥३॥

भावार्थ: विभीषणजीने [ माताके दर्शनकी ] सब युक्तियाँ ( उपाय ) कह सुनायीं। तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले। फिर वही ( पहलेका मसक-सरीखा ) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें ( वनके जिस भागमें ) सीताजी रहती थीं॥३॥

**चौ०** 
> देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥  
> कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥४॥

भावार्थ: सीताजीको देखकर हनुमान्‌जीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी ( लट ) है। हृदयमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप ( स्मरण ) करती रहती हैं॥४॥

**दो०** 
> निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।  
> परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥८॥

भावार्थ: श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं ( नीचेकी ओर देख रही हैं ) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीको दीन ( दुःखी ) देखकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी बहुत ही दुःखी हुए॥८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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