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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 7"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 7

**चौ०** 
> सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥  
> तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥१॥

भावार्थ: [ विभीषणजीने कहा— ] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर कृपा करेंगे?॥१॥

**चौ०** 
> तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥  
> अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥

भावार्थ: मेरा तामसी ( राक्षस ) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते॥२॥

**चौ०** 
> जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥  
> सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥३॥

भावार्थ: जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके ( अपनी ओरसे ) दर्शन दिये हैं। [ हनुमान्‌जीने कहा— ] हे विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा ही प्रेम किया करते हैं॥३॥

**चौ०** 
> कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥  
> प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥४॥

भावार्थ: भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [ जातिका ] चञ्चल वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों ( बंदरों ) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥४॥

**दो०** 
> अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।  
> कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥७॥

भावार्थ: हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्‌के गुणोंका स्मरण करके हनुमान्‌जीके दोनों नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया॥७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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