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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 60"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 60

**चौ०** 
> नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥  
> तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥१॥

भावार्थ: [ समुद्रने कहा— ] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जायँगे॥१॥

**चौ०** 
> मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥  
> एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥२॥

भावार्थ: मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके अनुसार ( जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा ) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका सुन्दर यश गाया जाय॥२॥

**चौ०** 
> एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥  
> सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥३॥

भावार्थ: इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया ( अर्थात्‌ बाणसे उन दुष्टोंका वध कर दिया )॥३॥

**चौ०** 
> देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥  
> सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया॥४॥

**छं०** 
> निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।  
> यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥  
> सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।  
> तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

भावार्थ: समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत ( उसकी सलाह ) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है। श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन।

**दो०** 
> सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।  
> सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज ( अन्य साधन ) के ही भवसागरको तर जायँगे॥६०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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