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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 55"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 55

**चौ०** 
> ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥  
> राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥१॥

भावार्थ: ये सब वानर बलमें सुग्रीवके समान हैं और इनके-जैसे [ एक-दो नहीं ] करोड़ों हैं, उन बहुत-सोंको गिन ही कौन सकता है ? श्रीरामजीकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकोंको तृणके समान [ तुच्छ ] समझते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥  
> नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥२॥

भावार्थ: हे दशग्रीव! मैंने कानोंसे ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरोंके सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रणमें न जीत सके॥ २ ॥

**चौ०** 
> परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥  
> सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥३॥

भावार्थ: सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपोंसहित समुद्रको सोख लेंगे। नहीं तो, बड़े-बड़े पर्वतोंसे उसे भरकर पूर ( पाट ) देंगे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥  
> गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥४॥

भावार्थ: और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लङ्काको निगल ही जाना चाहते हैं॥ ४॥

**दो०** 
> सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।  
> रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥५५॥

भावार्थ: सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु ( सर्वेश्वर ) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको जीत सकते हैं॥५५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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