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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 42"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 42

**चौ०** 
> अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥  
> साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥१॥

भावार्थ: ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये ( उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी )। [ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याणकी हानि ( नाश ) कर देता है॥१॥

**चौ०** 
> रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥  
> चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥२॥

भावार्थ: रावणने जिस क्षण विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव ( ऐश्वर्य ) से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मनमें अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले॥२॥

**चौ०** 
> देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥  
> जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥३॥

भावार्थ: [ वे सोचते जाते थे— ] मैं जाकर भगवान्‌के कोमल और लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं॥३॥

**चौ०** 
> जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥  
> हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥४॥

भावार्थ: जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें धारण कर रखा है, जो कपटमृगके साथ पृथ्वीपर [ उसे पकड़नेको ] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात्‌ शिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हींको आज मैं देखूँगा॥४॥

**दो०** 
> जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।  
> ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥४२॥

भावार्थ: जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे देखूँगा॥४२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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