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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 34"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 34

**चौ०** 
> नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥  
> सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥१॥

भावार्थ: हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये। हनुमान्‌जीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ‘एवमस्तु’ ( ऐसा ही हो ) कहा॥ १ ॥

**चौ०** 
> उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥  
> यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥२॥

भावार्थ: हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया॥ २ ॥

**चौ०** 
> सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥  
> तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥३॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे—कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा—चलनेकी तैयारी करो॥३॥

**चौ०** 
> अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥  
> कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥४॥

भावार्थ: अब विलम्ब किस कारण किया जाय ? वानरोंको तुरंत आज्ञा दो। [ भगवान्‌की ] यह लीला ( रावणवधकी तैयारी ) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने-अपने लोकको चले॥४॥

**दो०** 
> कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।  
> नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥३४॥

भावार्थ: वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये। वानर-भालुओंके झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥३४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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