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title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 20"
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# सुन्दरकाण्ड · दोहा 20

हनुमान्-रावण-संवाद

**चौ०** 
> ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥  
> तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥१॥

भावार्थ: उसने हनुमान्‌जीको ब्रह्मबाण मारा, [ जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े ] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्‌जी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥१॥

**चौ०** 
> जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥  
> तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥२॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी ( विवेकी ) मनुष्य संसार ( जन्म-मरण ) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्‌जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥२॥

**चौ०** 
> कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥  
> दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥३॥

भावार्थ: बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये ( तमाशा देखनेके लिये ) सब सभामें आये। हनुमान्‌जीने जाकर रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता ( ऐश्वर्य ) कुछ कही नहीं जाती॥३॥

**चौ०** 
> कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥  
> देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥४॥

भावार्थ: देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। ( उसका रुख देख रहे हैं। ) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्‌जीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़ निःशङ्क ( निर्भय ) रहते हैं॥४॥

**दो०** 
> कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।  
> सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥२०॥

भावार्थ: हनुमान्‌जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया॥२०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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