---
title: "सुन्दरकाण्ड दोहा 2"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/sunderkand/doha-2"
lang: "hi"
---

# सुन्दरकाण्ड · दोहा 2

**चौ०** 
> जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥  
> सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥१॥

भावार्थ: देवताओंने पवनपुत्र हनुमान्‌जीको जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धिको जाननेके लिये ( परीक्षार्थ ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमान्‌जीसे यह बात कही—॥१॥

**चौ०** 
> आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥  
> राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥२॥

भावार्थ: आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान्‌जीने कहा—श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ,॥२॥

**चौ०** 
> तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥  
> कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥३॥

भावार्थ: तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [ तुम मुझे खा लेना ]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्‌जीने कहा—तो फिर मुझे खा न ले॥३॥

**चौ०** 
> जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥  
> सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥४॥

भावार्थ: उसने योजनभर ( चार कोसमें ) मुँह फैलाया। तब हनुमान्‌जीने अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका मुख किया। हनुमान्‌जी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये॥४॥

**चौ०** 
> जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥  
> सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥५॥

भावार्थ: जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्‌जी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन ( चार सौ कोसका ) मुख किया। तब हनुमान्‌जीने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया॥५॥

**चौ०** 
> बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥  
> मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥६॥

भावार्थ: और वे उसके मुखमें घुसकर [ तुरंत ] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [ उसने कहा— ] मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने मुझे भेजा था॥६॥

**दो०** 
> राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।  
> आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥२॥

भावार्थ: तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले॥२॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/sunderkand/doha-1  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/sunderkand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/sunderkand/doha-3

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
