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title: "लंकाकाण्ड मंगलाचरण"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/mangalacharan"
lang: "hi"
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# लंकाकाण्ड · मंगलाचरण

मंगलाचरण · नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना

**श्लोक** 
> रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं  
> योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।  
> मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं  
> वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्॥ १ ॥

भावार्थ: कामदेवके शत्रु शिवजीके सेव्य, भव ( जन्म-मृत्यु ) के भयको हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहके समान, योगियोंके स्वामी ( योगीश्वर ), ज्ञानके द्वारा जानने योग्य, गुणोंकी निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, मायासे परे, देवताओंके स्वामी, दुष्टोंके वधमें तत्पर, ब्राह्मणवृन्दके एकमात्र देवता ( रक्षक ), जलवाले मेघके समान सुन्दर श्याम, कमलके-से नेत्रवाले, पृथ्वीपति ( राजा ) के रूपमें परमदेव श्रीरामजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥

**श्लोक** 
> शङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं  
> कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम्।  
> काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं  
> नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्॥ २ ॥

भावार्थ: शङ्ख और चन्द्रमाकी-सी कान्तिके अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले, व्याघ्रचर्मके वस्त्रवाले, कालके समान [ अथवा काले रंगके ] भयानक सर्पोंका भूषण धारण करनेवाले, गङ्गा और चन्द्रमाके प्रेमी, काशीपति, कलियुगके पाप-समूहका नाश करनेवाले, कल्याणके कल्पवृक्ष, गुणोंके निधान और कामदेवको भस्म करनेवाले पार्वतीपति वन्दनीय श्रीशङ्करजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥२॥

**श्लोक** 
> यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।  
> खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे॥ ३ ॥

भावार्थ: जो सत्पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ कैवल्यमुक्तितक दे डालते हैं और जो दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी श्रीशम्भु मेरे कल्याणका विस्तार करें॥३॥

**दो०** 
> लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।  
> भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥

भावार्थ: लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता?

**सो०** 
> सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।  
> अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु॥

भावार्थ: समुद्रके वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजीने मन्त्रियोंको बुलाकर ऐसा कहा—अब विलम्ब किसलिये हो रहा है? सेतु ( पुल ) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।

**सो०** 
> सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।  
> नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं॥

भावार्थ: जाम्बवान्‌ने हाथ जोड़कर कहा—हे सूर्यकुलके ध्वजा-स्वरूप ( कीर्तिको बढ़ानेवाले ) श्रीरामजी! सुनिये। हे नाथ! [ सबसे बड़ा ] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर ( जिसका आश्रय लेकर ) मनुष्य संसाररूपी समुद्रसे पार हो जाते हैं।

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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