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title: "लंकाकाण्ड दोहा 99"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 99

**चौ०** 
> तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥  
> सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥१॥

भावार्थ: उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनायी। शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़तीका संवाद सुनकर सीताजीके हृदयमें बड़ा भय हुआ॥१॥

**चौ०** 
> मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता॥  
> होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता॥२॥

भावार्थ: [ उनका ] मुख उदास हो गया, मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। तब सीताजी त्रिजटासे बोलीं—हे माता! बताती क्यों नहीं? क्या होगा? सम्पूर्ण विश्वको दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा?॥२॥

**चौ०** 
> रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥  
> मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही॥३॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र विपरीत ( उलटे ) ही कर रहा है। [ सच बात तो यह है कि ] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्‌के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है॥३॥

**चौ०** 
> जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा॥  
> जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए॥४॥

भावार्थ: जिसने कपटका झूठा स्वर्णमृग बनाया था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा हुआ है। जिस विधाताने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मणको कड़ुवे वचन कहलाये,॥४॥

**चौ०** 
> रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥  
> ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥५॥

भावार्थ: जो श्रीरघुनाथजीके विरहरूपी बड़े विषैले बाणोंसे तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःखमें भी जो मेरे प्राणोंको रख रहा है, वही विधाता उस ( रावण ) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं॥५॥

**चौ०** 
> बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की॥  
> कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी॥६॥

भावार्थ: कृपानिधान श्रीरामजीकी याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं। त्रिजटाने कहा—हे राजकुमारी! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा॥६॥

**चौ०** 
> प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥७॥

भावार्थ: परन्तु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमें जानकीजी ( आप ) बसती हैं॥ ७॥

**छं०** 
> एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।  
> मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥  
> सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।  
> अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥

भावार्थ: [ वे यही सोचकर रह जाते हैं कि ] इसके हृदयमें जानकीका निवास है, जानकीके हृदयमें मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं। अतः रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा। यह वचन सुनकर, सीताजीके मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुन्दरी! महान् सन्देहका त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा—

**दो०** 
> काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।  
> तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान॥९९॥

भावार्थ: सिरोंके बार-बार काटे जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तब सुजान ( अन्तर्यामी ) श्रीरामजी रावणके हृदयमें बाण मारेंगे॥ ९९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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