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title: "लंकाकाण्ड दोहा 97"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 97

**चौ०** 
> प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥  
> रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥१॥

भावार्थ: प्रभुने क्षणभरमें सब माया काट डाली। जैसे सूर्यके उदय होते ही अन्धकारकी राशि फट जाती है ( नष्ट हो जाती है )। अब एक ही रावणको देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभुपर बहुत-से पुष्प बरसाये॥१॥

**चौ०** 
> भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥  
> प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥२॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीने भुजा उठाकर सब वानरोंको लौटाया। तब वे एक दूसरेको पुकार-पुकारकर लौट आये। प्रभुका बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े। जल्दीसे कूदकर वे रणभूमिमें आ गये॥२॥

**चौ०** 
> अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें॥  
> सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥३॥

भावार्थ: देवताओंको श्रीरामजीकी स्तुति करते देखकर रावणने सोचा, मैं इनकी समझमें एक हो गया। [ परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ ] और कहा—अरे मूर्खो! तुम तो सदाके ही मेरे मरैल ( मेरी मार खानेवाले ) हो। ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाशपर [ देवताओंकी ओर ] दौड़ा॥३॥

**चौ०** 
> हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥  
> देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥४॥

भावार्थ: देवता हाहाकार करते हुए भागे। [ रावणने कहा— ] दुष्टो! मेरे आगेसे कहाँ जा सकोगे? देवताओंको व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़कर [ उन्होंने ] उसको पृथ्वीपर गिरा दिया॥४॥

**छं०** 
> गहि भूमि पार्यो लात मार्यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।  
> संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो॥  
> करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।  
> किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई॥

भावार्थ: उसे पकड़कर पृथ्वीपर गिराकर लात मारकर बालिपुत्र अंगद प्रभुके पास चले गये। रावण सँभलकर उठा और बड़े भयङ्कर कठोर शब्दसे गरजने लगा। वह दर्प करके दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बहुत-से बाण सन्धान करके बरसाने लगा। उसने सब योद्धाओंको घायल और भयसे व्याकुल कर दिया और अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा।

**दो०** 
> तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।  
> काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥९७॥

भावार्थ: तब श्रीरघुनाथजीने रावणके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले। पर वे फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थमें किये हुए पाप बढ़ जाते हैं ( कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं )!॥९७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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