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title: "लंकाकाण्ड दोहा 96"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 96

**चौ०** 
> अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥  
> रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥१॥

भावार्थ: क्षणभरके लिये वह अदृश्य हो गया। फिर उस दुष्टने अनेकों रूप प्रकट किये। श्रीरघुनाथजीकी सेनामें जितने रीछ-वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ ( चारों ओर ) प्रकट हो गये॥१॥

**चौ०** 
> देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा॥  
> भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा॥२॥

भावार्थ: वानरोंने अपरिमित रावण देखे। भालू और वानर सब जहाँ-तहाँ ( इधर-उधर ) भाग चले। वानर धीरज नहीं धरते। हे लक्ष्मणजी! हे रघुवीर! बचाइये, बचाइये, यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥  
> डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई॥३॥

भावार्थ: दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर भयानक गर्जन कर रहे हैं। सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जयकी आशा छोड़ दो!॥३॥

**चौ०** 
> सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥  
> रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥४॥

भावार्थ: एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं। इससे अब पहाड़की गुफाओंका आश्रय लो ( अर्थात्‌ उनमें छिप रहो )। वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी कुछ महिमा जानी थी॥४॥

**छं०** 
> जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।  
> चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥  
> हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे।  
> मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥

भावार्थ: जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे। वानरोंने शत्रुओं ( बहुत-से रावणों ) को सच्चा ही मान लिया। [ इससे ] सब वानर-भालू विचलित होकर ‘हे कृपालु! रक्षा कीजिये’ [ यों पुकारते हुए ] भयसे व्याकुल होकर भाग चले। अत्यन्त बलवान्‌ रणबाँकुरे हनुमान्‌जी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमिसे अङ्कुरकी भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणोंको मसलते हैं।

**दो०** 
> सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।  
> सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥९६॥

भावार्थ: देवताओं और वानरोंको विकल देखकर कोसलपति श्रीरामजी हँसे और शार्ङ्गधनुषपर एक बाण चढ़ाकर [ मायाके बने हुए ] सब रावणोंको मार डाला॥९६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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