---
title: "लंकाकाण्ड दोहा 94"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-94"
lang: "hi"
---

# लंकाकाण्ड · दोहा 94

रावण-हनुमान्-युद्ध, रावणका माया रचना, रामजीद्वारा माया-नाश

**चौ०** 
> आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥  
> तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥१॥

भावार्थ: अत्यन्त भयानक शक्तिको आती देख और यह विचारकर कि मेरा प्रण शरणागतके दुःखका नाश करना है, श्रीरामजीने तुरंत ही विभीषणको पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली॥१॥

**चौ०** 
> लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥  
> देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥२॥

भावार्थ: शक्ति लगनेसे उन्हें कुछ मूर्च्छा हो गयी। प्रभुने तो यह लीला की, पर देवताओंको व्याकुलता हुई। प्रभुको श्रम ( शारीरिक कष्ट ) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथमें गदा लेकर दौड़े॥२॥

**चौ०** 
> रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥  
> सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥३॥

भावार्थ: [ और बोले— ] अरे अभागे! मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभीसे विरोध किया। तूने आदरसहित शिवजीको सिर चढ़ाये। इसीसे एक-एकके बदलेमें करोड़ों पाये॥३॥

**चौ०** 
> तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥  
> राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥४॥

भावार्थ: उसी कारणसे अरे दुष्ट! तू अबतक बचा है। [ किन्तु ] अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है। अरे मूर्ख! तू रामविमुख होकर सम्पत्ति ( सुख ) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषणने रावणकी छातीके बीचो-बीच गदा मारी॥४॥

**छं०** 
> उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्‌यो।  
> दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्‌यो॥  
> द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।  
> रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥

भावार्थ: बीच छातीमें कठोर गदाकी घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रुधिर बहने लगा; वह अपनेको फिर सँभालकर क्रोधमें भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान्‌ योद्धा भिड़ गये और मल्लयुद्धमें एक दूसरेके विरुद्ध होकर मारने लगे। श्रीरघुवीरके बलसे गर्वित विभीषण उसको ( रावण-जैसे जगद्विजयी योद्धाको ) पासंगके बराबर भी नहीं समझते।

**दो०** 
> उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।  
> सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ॥९४॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! विभीषण क्या कभी रावणके सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही कालके समान उससे भिड़ रहा है। यह श्रीरघुवीरका ही प्रभाव है॥९४॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-93  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/lanka-kand/doha-95

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
