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title: "लंकाकाण्ड दोहा 92"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 92

रावणका विभीषणपर शक्ति छोड़ना, रामजीका शक्तिको अपने ऊपर लेना, विभीषण-रावण-युद्ध

**चौ०** 
> चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा॥  
> रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका॥१॥

भावार्थ: बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों। उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला। फिर रथको चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओंको गिरा दिया। तब रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था॥ १ ॥

**चौ०** 
> तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना॥  
> बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के॥२॥

भावार्थ: तुरंत दूसरे रथपर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे परद्रोहमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्यके होते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा॥  
> तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक॥३॥

भावार्थ: तब रावणने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजीके चारों घोड़ोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया। घोड़ोंको उठाकर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े॥ ३ ॥

**चौ०** 
> रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥  
> दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥४॥

भावार्थ: रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले॥ ४॥

**चौ०** 
> स्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना॥  
> तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे॥५॥

भावार्थ: रुधिर बहते हुए ही बलवान् रावण दौड़ा। प्रभुने फिर धनुषपर बाण सन्धान किया। श्रीरघुवीरने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओंसमेत दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये॥ ५॥

**चौ०** 
> काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने॥  
> प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए॥६॥

भावार्थ: [ सिर और हाथ ] काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया। इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे। परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये॥ ६॥

**चौ०** 
> पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥  
> रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥७॥

भावार्थ: प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरोंको काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाशमें सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों॥ ७॥

**छं०** 
> जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्रवत सोनित धावहीं।  
> रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं॥  
> एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।  
> जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं॥

भावार्थ: मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाणोंके [ बार-बार ] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते। एक-एक बाणसे समूह-के-समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्यकी किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओंको पिरो रही हों।

**दो०** 
> जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।  
> सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥९२॥

भावार्थ: जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम ( उन्हें भोगनेकी इच्छा ) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है॥ ९२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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