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title: "लंकाकाण्ड दोहा 89"
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# लंकाकाण्ड · दोहा 89

**चौ०** 
> देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥  
> सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥१॥

भावार्थ: देवताओंने प्रभुको पैदल ( बिना सवारीके युद्ध करते ) देखा, तो उनके हृदयमें बड़ा भारी क्षोभ ( दुःख ) उत्पन्न हुआ। [ फिर क्या था ] इन्द्रने तुरंत अपना रथ भेज दिया। [ उसका सारथि ] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया॥१॥

**चौ०** 
> तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥  
> चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥२॥

भावार्थ: उस दिव्य अनुपम और तेजके पुञ्ज ( तेजोमय ) रथपर कोसलपुरीके राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े। उसमें चार चञ्चल, मनोहर, अजर, अमर और मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले ( देवलोकके ) घोड़े जुते थे॥२॥

**चौ०** 
> रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी॥  
> सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी॥३॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। वानरोंकी मार सही नहीं जाती। तब रावणने माया फैलायी॥३॥

**चौ०** 
> सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची॥  
> देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी॥४॥

भावार्थ: एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी। सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी उस मायाको सच मान लिया। वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक्ष्मणजीसहित बहुत-से रामोंको देखा॥४॥

**छं०** 
> बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।  
> जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे॥  
> निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी।  
> माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी॥

भावार्थ: बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये। लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे-से जहाँ-के-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेनाको आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान्‌ हरि ( दुःखोंके हरनेवाले श्रीरामजी ) ने हँसकर धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली। वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी।

**दो०** 
> बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर।  
> द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥८९॥

भावार्थ: फिर श्रीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले—हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [ मेरा और रावणका ] द्वन्द्वयुद्ध देखो॥८९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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